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Gurukul Blog

 
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Ladies First

Mar 08, 2015

इस वर्ष नारी-सशक्तिकरण हमारे गणतन्त्र दिवस का मुख्य थीम था। महिला सुरक्षा एवं जागरूकता के लिए शासन की ओर से की गई ये प्रतीकात्मक पहल है। आशा की जाती है कि इसे और व्यावहारिकता प्रदान करते हुए सरकार महिलाओं की सुरक्षा के लिए कठोरतर कानूनों का प्रावधान करेगी और उन्हें मजबूत इच्छाशक्ति के साथ लागू करेगी, क्योंकि महिलाओं के बारे में अब परिस्थितियां इतनी विकट हो चुकी हैं कि अन्तिम सीमा तक जा पहुंची हैं। यानी आज नारी की दयनीय स्थिति को दर्शाने के लिए सिर्फ इतना कहने की गुंजाइश नहीं बची है कि वो घरेलू हिंसा की शिकार है, कार्यस्थितियां उसके अनुकूल नहीं हैं, उसे नौकरी पेशे में समान अवसर उपलब्ध नहीं हैं आदि। इन सब buffer facts को एक तरफ़ हटा दीजिए, सीधी बात कीजिए कि नारी सुरक्षित नहीं है, वो बलात्कार जैसे चरम दुष्कृत्य की शिकार हो रही है। इसलिए इतने नारकीय अपराध को लेकर अगर हमारी दण्ड व्यवस्था लचर है तो न्याय के प्रति हमारी प्राथमिकता पर ही प्रश्नचिह्न लग जाता है। बल्कि हमसे सीधा सवाल किया जा सकता है कि हर दशहरे पर रावण का पुतला फूंकने की चिरकालिक परम्परा वाले हम लोग अच्छाई के पोषक हैं या बुराई के?
चलिए जो प्रशासन को करना है वो प्रशासन करेगा। लेकिन जब समस्या इतनी विकट हो तो जिम्मेदारी एक पक्ष की नहीं होती। आत्ममन्थन जरूरी है। महिलाओं की इस दशा के लिए तमाम कारण गिनाए जा सकते हैं, अनेक बिन्दुओं पर चर्चा हो सकती है लेकिन सबसे निर्णायक तत्व ये है कि आज महिला को अपने अस्तित्व के बारे में इस रूप में सजग रहने की सर्वाधिक आवश्यकता है कि उसके साथ व्यक्ति जैसा व्यवहार किया जाए, वस्तु जैसा नहीं। टेलीविजन और फिल्मों में नारी स्वयं को एक वस्तु की तरह पेश करके जिस प्रकार से लोगों को entertain कर रही है उससे उसकी गरिमा खत्म हो रही है। उसके प्रति सम्मान का भाव खत्म हो रहा है। उसे एक शख्सियत होना चाहिए, नुमाइश नहीं।
यूं तो अनेक संस्थानों एवं आन्दोलनों ने नारी के हित में पुरजोर आवाजें उठाईं। एक ज़माना था जब feminist आन्दोलन बडे ज़ोरों पर था। ऐसे सवाल भी उठाए गए कि आप manners को manners ही क्यों कहते हैं womanners क्यों नहीं कहते। यहां तक कि आम को mango क्यों कहा जाता है womango भी तो कहा जा सकता है। लेकिन ये अतिवाद भी महिलाओं को उनका न्यायसंगत स्थान नहीं दिला सका। महिलाओं के लिए हमेशा equal rights की मांग की जाती है, लेकिन 19वीं सदी के क्रान्तदर्शी समाज सुधारक महर्षि दयानन्द ही ये जान पाए कि equal rights से नारी के लिए सिर्फ़ अतिरिक्त कार्यक्षेत्र बढ सकते हैं, सम्मान नहीं। इसीलिए उन्होंने नारी को केवल बराबर के हक तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे वन्दनीय माना। इस दृष्टि से एक साथ दो कार्य सिद्ध होते हैं, प्रथम- नारी के अधिकारों की सुरक्षा और दूसरा- उसकी मर्यादा की सुनिश्चितता। सीधी सी बात है कि नारी अगर वन्दनीय स्थान पर है तो कोई उसके अधिकारों का हनन नहीं करेगा और क्योंकि वो स्वयं को सम्मानित व्यक्ति मानती इसलिए स्वयं मर्यादाओं का उल्लंघन भी नहीं करेगी।
लेकिन त्रासदी यही है कि हमारे देश की महिला अपने सम्मान को ढूंढने के लिए पाश्चात्य जगत की ओर भाग रही है। पश्चिम में नारी को कौन सा दर्जा प्राप्त था इसका अन्दाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि एरिस्टोटल जैसा प्रबुद्ध विचारक भी महिलाओं की बुद्धि को पुरुषों से कम मानता था। इसके पीछे तर्क ये था कि महिलाओं के 28 दांत होते हैं और पुरुषों के 32 । इतना प्रयोगधर्मी दार्शनिक जो भारत से चीज़ें मंगा-मंगाकर experiments करता था, उसके घर में उसकी 2-2 पत्नियां थीं, 2-2 readily available laboratories उसके पास थीं फिर भी उसने इतनी कोशिश नहीं की कि उनके दांत गिन भी ले। ये है पश्चिम में नारी का सम्मान, जिसका अनुकरण करने के लिए हम उतावले हुए जा रहे हैं। सिर्फ़ वेश-भूषा, फैशन आदि में किसी सभ्यता का अनुकरण सिर्फ़ उस हद तक किया जाना चाहिए जितना हमारे अपने समाज में सहज स्वीकार्य हो। अगर ये उससे आगे बढ जाता है तो अनुकरण नहीं, अन्ध अनुकरण कहलाएगा। किसी कार्य की अवस्था विशेष के अनुकूल धारण किया जाने वाला वस्त्र-विन्यास व सज्जा तो समझ में आती है लेकिन बेतुके एवं अनावश्यक ध्यानाकर्षण वाले अनुकरण अर्थात् नकल कहां तक उचित है? हर सभ्यता का एक शील होता है, अगर हम अपने उस शील को किसी सभ्यता के अनुकरण के बावजूद बरकरार रख सकें तो फिर भी कुछ स्वीकार्य है। लेकिन विडम्बना तो यही है कि कई मामलों मे उनका आरम्भबिन्दु हमारी लक्ष्मण रेखा होती है, तो निश्चित है कि उन चीजों की हम शुरुआत भी करेंगे तो सीमा का उल्लंघन हो जाएगा। इसलिए ये सभ्यताओं की बराबरी का नहीं बल्कि स्वीकृत चलन और परम्पराओं के अनुपालन का मामला है। अगर इसका ध्यान नहीं रखा गया तो शान्ति नहीं बनी रह सकती। परम्पराएं अगर रूढीवादी न हों तो उनके पालन में बुराई नहीं है, बल्कि वो तो हमारे व्यक्तित्व को गरिमा ही प्रदान करती हैं।
अगर पश्चिमी खुलापन इतना ही कारगर होता तो आज बलात्कार के सर्वाधिक मामले अमरीका में ना होते। अत: महिलाओं को स्वयं ये निर्णय करना होगा कि वे अमर्यादित खुलेपन और गरिमापूर्ण शील में से किसे अधिमान देना चाहेंगी। और किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पूर्व इतना अवश्य जान लें कि चारित्रिक अपकीर्ति को सहन न कर पाना नारी का सार्वभौम स्वभाव है। इसलिए बेहतर यही होगा कि आत्मसम्मान के अपने इस भाव को ही वे अपना मुख्य सुरक्षा कवच बनाएं। बेशक वे लोग तो अपराधी हैं ही जो महिलाओं के साथ अन्यायपूर्ण आचरण करते हैंं और सचमुच कठोरतम दण्ड के अधिकारी हैं, लेकिन हमें स्वयं भी अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए। हमारी सूझ-बूझ, हमारा सधा हुआ आचरण, हमारी दृष्टि का ओज, आत्मसम्मान का गरिमामय भाव हमें वो सुरक्षा-चक्र प्रदान करता है जिसे भेदना आसान नहीं है। इसलिए दूसरों से आशा करने से पूर्व क्यों ना हम स्वयं से शुरुआत करें? Ladies first??

 

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